कुलगीत
अज्ञान तिमिर हरने को प्रतिपल, तत्पर विद्या भवन हमारा।
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा।।
तमस कलुष धुल जाता है,
ज्ञान की अमृत धारा में।
नया क्षितिज मिल जाता है,
नित नूतन श्रम की धारा में।।
यहाँ की पावन धरती पर, हर पल ढलता व्यक्तित्व हमारा।।
राम-रहीम की पावनता से,
नित नूतन सजे चरित्र हमारा।
त्रिधाराएँ अभिषेक कर रहीं,
ऐसा है सौभाग्य हमारा।।
सुरक्षित है आदर्शों से, पर्यावरण यहाँ का सारा।।
जीवन मूल्यों का श्रृंगार यहाँ,
नव ज्ञान की जय जयकार यहाँ।
घने वृक्षों की शीतल छाया,
स्वर्णिम किरण वितान यहाँ।।
ज्योति जलाकर विद्या की, भव सागर से मिले किनारा।।
कण-कण यहाँ का गीत गाता,
त्याग का बलिदान का।
हर सवेरा संदेश लाता,
मानवता के त्राण का।।
देशोन्नति में रहे समर्पित, यही रहा है लक्ष्य हमारा।
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा।।
— पूर्व प्राचार्य डॉ. शीला रानी खरे द्वारा रचित
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा।।
तमस कलुष धुल जाता है,
ज्ञान की अमृत धारा में।
नया क्षितिज मिल जाता है,
नित नूतन श्रम की धारा में।।
यहाँ की पावन धरती पर, हर पल ढलता व्यक्तित्व हमारा।।
राम-रहीम की पावनता से,
नित नूतन सजे चरित्र हमारा।
त्रिधाराएँ अभिषेक कर रहीं,
ऐसा है सौभाग्य हमारा।।
सुरक्षित है आदर्शों से, पर्यावरण यहाँ का सारा।।
जीवन मूल्यों का श्रृंगार यहाँ,
नव ज्ञान की जय जयकार यहाँ।
घने वृक्षों की शीतल छाया,
स्वर्णिम किरण वितान यहाँ।।
ज्योति जलाकर विद्या की, भव सागर से मिले किनारा।।
कण-कण यहाँ का गीत गाता,
त्याग का बलिदान का।
हर सवेरा संदेश लाता,
मानवता के त्राण का।।
देशोन्नति में रहे समर्पित, यही रहा है लक्ष्य हमारा।
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा।।
— पूर्व प्राचार्य डॉ. शीला रानी खरे द्वारा रचित
